निकाय चुनाव : बैलेट में पहली बार नोटा, नजदीकी मुकाबले होने के आसार

रायपुर। पार्षद बनकर राजनीति की शुरुआत करने जा रहे प्रत्याशियों के सामने अपने ही वार्ड में नकारे जाने का खतरा हो गया है। अगले माह होने जा रहे निकाय चुनावों में छत्तीसगढ़ में पहली बार मतपत्रों नोटा का इस्तेमाल होगा। राज्य निर्वाचन आयोग ईव्हीएम की तरह तरह बैलेट पेपर पर भी नोटा(नन ऑफ द एबव) का ऑप्शन रखेगा। पहली बार साल 2013 के चुनाव में लोगों ने ईव्हीएम में नोटा का उपयोग किया था। राज्य सरकार ने इस साल दिसंबर में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव बैलेट पेपर का निर्णय लिया है।

बैलेट पेपर के साथ मतपेटियों का उपयोग भी किया जाएगा। राज्य निर्वाचन आयोग केन्द्रीय चुनाव आयोग की तर्ज पर इस बार यह प्रयोग करने जा रहा है। दूसरी और बैलेट पेपर में नाेटा रखे जाने से पार्षद चुनाव में जीत का अंतर काफी कम रह जाएगा क्योंकि बड़े निगमों को छोड़ दें तो लगभग सभी निकायों में वार्डों की जनसंख्या 15 सौ से 15 हजार तक ही है। इसमें भी जीत का हार अंतर 300 से 1200 तक का होता है। यदि अब मतदाताओं के पास नोटा का ऑप्शन भी रहेगा तो निश्चित ही जीत का का अंतर काफी कम हो सकता है। इसके अलावा कहीं-कहीं पर तो जीत-हार के अंतर से ज्यादा नोटा को भी मिल सकते हैं।

अल्फाबेट नहीं पार्टी के आधार पर होंगे नाम, फोटो भी 
वहीं इस बार बैलेट पेपर में प्रत्याशियों के नाम अल्फाबेटिकल नहीं बल्कि पार्टी के नाम के आधार पर रहेगा। क्योंकि पिछले बार हुए निकाय चुनाव में अल्फाबेट के कारण बड़ी पार्टियों के प्रत्याशियों के नाम काफी नीचे थे। इस बार नामाें के साथ तस्वीरें भी होंगी।

लोकसभा में 5.57 फीसदी नोटा को 
लोकसभा चुनाव के दौरान लगभग 5.57 फीसदी वोट नोटा को पड़े। राज्य में कुल 1करोड़ 89 लाख 16 हजार285 वोटर हैं। कुल 71.48 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का उपयोग किया इनमें से 5.57 प्रतिशत यानी 1लाख 96 हजार 265 लोगों ने नोटा दबाया। सबसे ज्यादा बस्तर में 41667 और सबसे कम दुर्ग में 4271 लोगों ने नोटा का उपयोग किया। खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ में दुर्ग लोकसभा सीट से ही भाजपा प्रत्याशी ने सबसे बड़ी जीत 3लाख 91 हजार978 वोटों से दर्ज की है।

विधानसभा में आप से ज्यादा वोट नोटा को
साल 2018 के विधानसभा चुनाव में 10 सीटों पर नोटा का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है। इनमें चार बस्तर संभाग की हैं। इस बार नोटा में सबसे ज्यादा वोट दंतेवाड़ा सीट पर पड़ा है। इसके विपरीत जिन 10 सीटों पर सबसे कम नोटा का उपयोग हुआ है, उनमें से ज्यादातर शहरी क्षेत्र की विधानसभा सीटें शामिल हैं। वहीं नोटा को आम आदमी पार्टी से ज्यादा वोट मिले। आप ने 85 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे इन्हें कुल 0.9फीसदी वोट मिले, जबकि नोटा को 2फीसदी वोट मिले। आप के अलावा भाकपा, सपा और राकांपा उम्मीदवारों का वोट शेयर भी नोटा से कम रहा।

मरकाम, रेणु, देवव्रत जीते पर नोटा से कम वोट पाकर 
कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम कोंडागांव के विधायक हैं उन्होंने यह सीट 1796 वोटों से जीती लेकिन यहां नोटा को 5146 वोट मिले। वहीं कोटा विधानसभा से रेणु जोगी ने 3026 वोटों से जीत हासिल की जबकि यहां नोटा को 3942 वोट मिले। इसी तरह कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक गुरमुख सिंह होरा धमतरी में सिर्फ 464 वोटों से हारे जबकि यहां नोटा को 551 वोट मिले हैं। ऐसी ही जीत खैरागढ़ में जाेगी कांग्रेस के नेता देवव्रत सिंह को मिली है। देवव्रत 870 वोटों से जीते जबकि यहां नोटा को 3068 वोट मिले।

इसलिए नोटा जरूरी : आयोग के अधिकारियों का मानना है कि जब देश में होने वाले सभी बड़े चुनाव में नोटा का ऑप्शन दिया जाता है तो इसमें भी देना जरूरी है। अफसरों का यह भी मानना है कि कानूनन और  नियमानुसार इसलिए भी ऐसा किया जा रहा है ताकि चुनाव के बाद उन तक कोई आपत्ति न पहुंचे।

ताकि विवाद न हो 
ईव्हीएम की तरह इस बार हम बैलेट पेपर में भी नोटा का उपयोग करने जा रहे हैं। साथ ही प्रत्याशियों के नाम पार्टी के आधार पर होंगे, अल्फाबेटिकल नहीं। प्रत्याशियों की तस्वीरें भी साथ में होंगी। चुनाव के बाद होने वाले किसी भी तरह के विवाद से निपटने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ऐसा करने जा रही है।  -ठाकुर राम सिंह, राज्य निर्वाचन आयुक्त

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