मेडिकल काॅलेज अस्पताल के खिलाफ तीन फैसले, दो साल की कानूनी लड़ाई, तीन परिवारों को मिलेगा 10-10 लाख का मुआवजा 

 

रायपुर : प्रदेश में दो से तीन साल पुराने डाॅग बाइट (कुत्ते का हमला) से बच्चों की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने तीन परिवारों को 10-10 लाख रुपए के मुआवजे का आदेश दिया है। इनमें से दो बच्चे रायपुर और तीसरा पेंड्रारोड का था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अंबेडकर अस्पताल चला रहे मेडिकल काॅलेज प्रबंधन की ओर से तीन परिवारों को मुआवजा देना पड़ा है। इन मामलों में परिजन के वकील दस्तावेजों से यह साबित करने में कामयाब रहे कि डाॅग बाइट के मरीज के इलाज में अस्पताल ने लापरवाही की और एंटी रैबीज इंजेक्शन नहीं थे।

यह मौत की वजह बनी। दरअसल जिन तीन परिवारों के बच्चों की डाॅग बाइट से मौत हुई, उनमें दो राजधानी रायपुर और एक पेंड्रारोड का है। इनमें से दो बच्चों को डाॅग के हमले के बाद सीधे अंबेडकर अस्पताल लाकर भर्ती किया गया था। जबकि पेंड्रारोड का परिवार राजधानी के निजी नर्सिंग होम में बच्चे का इलाज करवा रहा था। हालत बिगड़ने पर इस बच्चे को अंबेडकर अस्पताल में भर्ती किया गया और उसकी मृत्यु भी यहीं हुई। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पहले दो मामले में अंबेडकर अस्पताल प्रबंधन को मुआवजा  के आदेश दिए। अस्पताल प्रबंधन ने नेहरू मेडिकल कालेज के ऑटोनाॅमस फंड से चेक दिए गए। इसके बाद पेंड्रा के मामले में भी हाईकोर्ट ने अंबेडकर अस्पताल को ही मुआवजे का आदेश दिया, क्योंकि बच्चे की मौत यहीं हुई थी। उसके परिजन को भी कुछ दिन पहले 10 लाख रुपए का चेक दिया गया।

स्वास्थ्य विभाग ने सिस्टम बदला अब सीएमओ को देना होगा ब्योरा
इतना तगड़ा मुआवजा देने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने डाॅग बाइट के मामले में पूरा सिस्टम बदल दिया है। सभी अस्पतालों को निर्देश दिए गए हैं कि उनके यहां जैसे ही डाॅग बाइट का मामला आता है, उन्हें इसकी जानकारी सीएमओ को देनी होगी। इसके लिए एक निर्धारित प्रोफार्मा बनाया गया है। इस प्रोफार्मा में पीड़ित का नाम, पिता का नाम-पता, घटनास्थल, समय और किस अंग पर डाॅग बाइट हुई, जैसी जानकारियां शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग ने साफ किया है कि जिस अस्पताल ने ऐसा नहीं किया, उसके प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई होगी। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि मुआवजे के तीनों मामलों में अस्पतालों और सीएमओ के बाद ऐसा ब्योरा नहीं था, जो यह साबित कर सके कि इलाज में लापरवाही नहीं की गई। वकीलों का दावा है कि अस्पताल प्रबंधन के प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया था कि जिस वक्त डाॅग बाइट का पेशेंट पहुंचा, एंटी रैबीज इंजेक्शन नहीं थे।

परिजन की लापरवाही हो तो वह भी सामने आये
डाॅग बाइट में पूरा ब्योरा लेने का फैसला इसलिए लिया गया है, ताकि अस्पताल के साथ-साथ अगर परिजन ने भी इलाज में देरी या लापरवाही की हो तो उसका रिकार्ड स्वास्थ्य विभाग के पास रहे। डाक्टरों के मुताबिक कुछ मामलों में परिजन डाॅग बाइट के हफ्ते-दस दिन बाद भी हालत बिगड़ने पर अस्पताल आते हैं, लेकिन अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लग जाता है। ब्योरा प्रोफार्मा में होगा तो ऐसी गड़बड़ी नहीं होगी।

छत्तीसगढ़ के साथ महाराष्ट्र-केरल में भी मुआवजा जबकि मध्यप्रदेश ने आपदा मानने से किया इनकार
मध्यप्रदेश के राजस्व विभाग ने कुत्ता काटने की घटना को प्राकृतिक आपदा नहीं माना है। साथ ही ऐसे मामले में क्षतिपूर्ति या मुआवजा देने से इंकार कर दिया है। गौरतलब है कि राज्य मानवाधिकार आयाेग ने भोपाल में आवारा कुत्तों के हमले के कारण हुई माैत और घायलाें काे लेकर 13 बिंदुओं पर सरकार से 17 मई 2019 काे सिफारिश की थी। आयाेग ने कहा था कि कुत्ता काटने के मामले काे सांप काटने की तरह प्राकृतिक आपदा मानते हुए पीड़िताें काे अंतरिम राहत देने का प्रावधान किया जाए, जिसे सरकार ने मानने से इंकार कर दिया है। अब यह मामला हाईकाेर्ट पहुंच गया है। इससे पहले मध्यप्रदेश मानवाधिकार आयोग ने अपने अध्ययन में पाया था कि महाराष्ट्र और केरल के बाद अब छत्तीसगढ़ ने भी डाॅग बाइट को दुर्घटना और प्राकृतिक आपदा मान लिया है। इस आधार पर पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान है।

हाईकोर्ट में वकीलों ने लगाया लापरवाही का केस, इलाज की फाइल और अस्पताल की पर्ची सर्वाधिक काम आई

रायपुर में घर के बाहर खेलती मेरी मासूम बेटी दिव्या को जब आवारा कुत्ते ने काटा, तोे दिल दहल गया। चेहरे पर कई चोटें थीं। आनन-फानन में हमने उसे एक निजी अस्पताल में एडमिट करवाया। स्थिति नहीं सुधरने पर बेटी को लेकर अंबेडकर अस्पताल लेकर आए। डॉग बाइट के 18 वें दिन बेटी नहीं रही। हमारी बेटी की मौत इलाज में लापरवाही से हुई थी, क्योंकि अस्पताल में किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। एंटी रैबीज के अलावा उसे विशेष सीरम लगने थे, जो नहीं लगे। घर में मातम था, सभी सदमे में थे। तभी किसी रिश्तेदार ने कहा कि क्यों न इस लापरवाही के लिए सरकार पर केस करें।

कई वकीलों से बातचीत हुई और उन्होंने कहा कि वकील के जरिए सीधे हाईकोर्ट में लापरवाही का केस कर सकते हैं। वकील के जरिए जो केस फाइल हुआ , इसमें बच्ची के इलाज के पूरे कागज अटैच किए, क्योंकि इसे संभाल कर रखा था। लेकिन अस्पताल में दाखिले के समय मिली वह पर्ची सबसे ज्यादा काम की निकली, जिसमें लिखा था – सीवियर डाॅग बाइट। अदालत ने दवा-इलाज से संबंधित कुछ और कागज मांगे। हमने प्रबंधन को वकील के जरिए आवेदन दिया और देरी से ही सही, अस्पताल ने कागज भिजवाए। जज ने आखिर में हमारे पक्ष में फैसला दिया। मेडिकल कॉलेज से हमें 10 लाख का चैक मिल गया। बेटी के जाने का गम तो कभी खत्म नहीं होगा। साथ ही, सबको रास्ता भी मिला कि अस्पताल की पर्ची और हाईकोर्ट में केस किस तरह लगाया जाए। जैसा कि 5 साल की बच्ची को खोने वाले पिता अशोक वर्मा ने भास्कर को बताया।

इस पूरी प्रक्रिया से मिलेगा मुआवजा

कुत्ते के काटने से मौत पर सीधे हाईकोर्ट में केस लगाया जा सकता है।

हाईकोर्ट में इलाज में लापरवाही का केस वकील ही लगा सकते हैं।

जिस अस्पताल में पीड़ित भर्ती होगा, उसकी एडमिशन पर्ची जरूरी होगी।

हर अस्पताल इलाज की फाइल तैयार करता है। इसे भी रखना जरूरी होगा।

कोई दस्तावेज न हो तो चिट्‌ठी के जरिए अस्पताल से मांग सकते हैं। अस्पताल प्रबंधन देने को बाध्य है।

एंटी रैबीज का संकट अब भी

दो माह पहले तक पूरे प्रदेश में वैक्सीन के लिए मारामारी मची हुई थी। सीजीएमएससी के गोदाम से लेकर मेडिकल स्टोर व थोक दवा बाजार में एंटी रैबीज वैक्सीन की कमी थी। अब स्थिति में कुछ सुधार आया है। सीजीएमएससी के गोदाम में भी वैक्सीन पर्याप्त होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि कई मेडिकल स्टोर वाले अभी भी ब्लैक में वैक्सीन बेच रहे हैं।

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